हिजाब बैन: स्कूल यूनिफॉर्म की सरकारी समझ छात्राओं के शिक्षा के अधिकार के ऊपर नहीं है HijabRow RighttoEducation हिजाबविवाद शिक्षाकाअधिकार
कर्नाटक के उच्च न्यायालय ने शिक्षा संस्थानों, कक्षाओं में हिजाब पर प्रतिबंध लगानेवाले राज्य सरकार के आदेश को उचित ठहराया है. यह निर्णय अपनी पहचान के साथ शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार को सीमित करता है.
धर्मों का इतिहास जटिल है और धर्मों को धारण करने वालों के लिए उसकी व्याख्याएं भी भिन्न-भिन्न हो सकती हैं. क्या किसी धर्म से संबंधित सारी बातें, उसके सारे रीति-रिवाज किसी एक मूल ग्रंथ में पाए जाते हैं? क्या काल क्रम में धर्मों में परिवर्तन नहीं होता है? किस तरह तय होगा कि मैं जिसे अपना अनिवार्य धार्मिक व्यवहार मानता हूं, वह अनिवार्य नहीं है?
तार्किक परिणति यही हो सकती है. मुझे किसी की ललाट पर विभूति अटपटी लग सकती है लेकिन वह उसके लिए अनिवार्य है. क्या स्कूल उसे मिटा देगा? या बिंदी अथवा सिंदूर? इनका जिक्र किसी ऐसे ग्रंथ में नहीं जिसके आधार पर इन्हें अनिवार्य कहा जाए. अदालत ने स्कूल की तुलना जेल, युद्ध स्थल और अदालतों से करते हुए उसे विशिष्ट सार्वजनिक स्थल घोषित किया और कहा कि जैसे इन स्थलों पर आप कई अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकते वैसे ही शिक्षा संस्थान में भी आप उसका दावा नहीं कर सकते.
यानी मुगलों को भी बाहरी ठहराने का एक मौक़ा निकाल लिया गया. वह बार-बार कहती है कि हम विदेशी उदाहरण नहीं लेंगे. लेकिन फिर वर्दी का अपना तर्क पुष्ट करने के लिए वह अमेरिका से उदाहरण लाती है. इससे भी इस निर्णय के पीछे के कुंठित राष्ट्रवाद का पता चलता है. वर्दी विविधता को पूरी तरह समाप्त कर एकरूपता थोपने के लिए नहीं है. उस विविधता को पगड़ी, हिजाब, टीके, बिंदी, नाक या कान के बुंदे व्यक्त करते हैं. क्या किसी की पगड़ी से किसी अन्य में असमानता की भावना या हीन भावना पैदा होती है? अगर नहीं तो किसी के हिजाब से क्यों होनी चाहिए? क्या किसी औरत के हिजाब पहनने से दूसरे लोगों में कोई कुंठा पैदा होती है?
यहां तक कि कि वह शिक्षक के कर्तव्य और अधिकार की अहमियत साबित करने के लिए छात्र को छड़ी लगाए जाने का उदाहरण चुनकर पेश करती है. यह भूलते हुए कि इस देश में और ज़्यादातर जगहों पर स्कूलों में शारीरिक दंड अपराध है. फिर ऐसा उदाहरण चुन ही कैसे लिया गया? इससे उस दिमाग का पता चलता है जो इस फैसले को लिख रहा है.