अविचल: हिंदी हैं हम

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अविचल: हिंदी हैं हम
अविचलहिंदीभाव
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मैथिलीशरण गुप्त की कविता से प्रेरित यह कहानी 'अविचल भाव' की महत्ता को दर्शाती है।

हिंदी हैं हम शब्द श्रंखला में आज का शब्द है अविचल , जिसका अर्थ है अचल, स्थिर, अटल। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता- चांडाल हुआ किसी नृप के घर लाल, तन पर किंतु रीछ-से बाल! बोले तब दैवज्ञ विशाल— “झाड़े कहीं इसे चांडाल!” सुन कर सभी हो गए सन्न; पर क्या करते नहीं विपन्न? लेकर उसे नदी के पार, पहुँचा सचिव श्वपच के द्वार। परम स्वच्छ था उसका गेह; अविचल मन था, निर्मल देह। सुस्थिर मुद्रा में आसीन, वह था प्रभु-चिंतन में लीन। किया नहीं उसने दृकपात, कर न सका मंत्री भी बात। सोचा किया दृष्टि निज डाल— “इस

जन का क्या है चांडाल? पावे आसा द्विज भी ख्याति, सचमुच आत्मा की क्या जाति? अपने जल से, ऐसा डोम, जला सकेगा क्या ये रोम?” तब तक हो निवृत्त मातंग, बोला बड़े विनय के संग— “प्रभु, यह कैसा अचरज आज? पड़ी कहाँ यह पद-रज आज? समदर्शी हैं घन, रवि, सोम, फिर भी यह किंकर है डोम।” कहा सचिव ने तब सस्नेह— कि “तुम ‘महत्तर’ निस्संदेह। हो शरीर का कोई वंश, जीव सभी ईश्वर के अंश। मुझे श्वपच ही से है काम, आया व्यर्थ तुम्हारे धाम।” यह कह सचिव चला अन्यत्र, आतप रोक रहा था छत्र। पड़ी पुन: सरिता की रेत, मानों रत्न-कणों का खेत। उसमें पथिकों का पथ छेक,— अड़ी खड़ी थी गाड़ी एक। थक कर बैठ गया था बैल, रुकी हुई थी सारी गैल। गाड़ीवान बैल को डाट, मुँह से पूँछ रहा था काट! काला और कुरूप कराल, मैल दाँत विलोचन लाल। फिर भी पहने था उपवीत! काँप गया नृप-सचिव सभीत। पुलक उठा फिर उसका गात्र— देखा जो उसका जल-पात्र। “इसके जल-स्पर्श से हाल झड़ जावेंगे शिशु के बाल?” बोला वह—“भाई, तू कौन?” पर गाड़ीवाला था मौन। फिर फिर पूछा—था ही रुष्ट, गरजा पकड़ जनेऊ दुष्ट;— “अब भी नहीं गया यह टूट, गई अरे क्या तेरी फूट? मैं हूँ कौन? तुझे क्या काम? सुना नहीं बाँमन का नाम?” “अहा! क्या ब्राह्मण हैं आप? रहें दयालु, न दें अभिशाप। मिले एक अँजलि जल मात्र, खिले सुमन-सा शिशु का गात्र।” बोला क्रूर—“जला मत हाड़, जा, पत्थर पर उसे पछाड़! समझ लिया क्या मुझे कहार?” रुष्ट हुआ मंत्री इस बार, दिया सेवकों को आदेश— “पकड़ो इस खल को धर केश।” थी बस, आज्ञा की ही देर, लिया उसे भृत्यों ने घेर। मंत्री ने ले उसका नीर सींचा शिशु का मृदुल शरीर। क्या आश्चर्य हुआ तत्काल,— झड़े बाल के तनु के बाल! दमक उठे कुंदन-से अंग। उठी हर्ष की एक उमंग। पहुँचे फिर सब नृप के पास, वह थ

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अविचल हिंदी भाव कहानी मैथिलीशरण गुप्त

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